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समन्वयवादी राजनीति के आधार स्तंभ थे अटल जी, जीता दुनिया का दिल

अटल जी समन्वयवादी राजनीति के आधार स्तंभ थे। उन्होंने देश, विदेश और दुनिया में इसके जरिए न केवल सबका दिल जीता, बल्कि भारत की एक अलग पहचान बनाई।

पूर्व केन्द्रीय मंत्री, भाजपा की तीन धरोहर में एक और कानपुर से सांसद डा. मुरली मनोहर जोशी  का मानना है कि वह देश के आंतरिक मामलों में भी उतने ही संवेदनशील, समन्वयवादी थे, जितना कि अंतरराष्ट्रीय मसलों पर। उनके काम करने का तरीका निराला था। यह उनकी ही देन थी कि भाजपा के पास बहुमत नहीं था और भाजपा ने तीन बार सरकार बनाई। तीसरी बार की सरकार ने अपना कार्यकाल सफलतापूर्वक पूरा किया।

भाजपा की तीन धरोहर, अटल, आडवाणी, मुरली मनोहर। कभी यह नारा पूरे देश में गूंजा था। मुरली मनोहर जोशी इस नारे की आखिरी कड़ी हैं। नारे का ताज अब इस दुनिया को छोडक़र अनंतपथ का गामी हो चुका है।

अटल जी और मुरली मनोहर का अलग स्तर का साथ था। करीब से जानने वाले बताते हैं कि अटल जी जब भी इलाहाबाद जाते थे, वह डा. मुरली मनोहर जोशी के यहां ठहरते थे। खिचड़ी प्रिय थी और साथ में खाते थे। वही डा. जोशी आज अटल जी के कामकाज को याद करके भावुक हो उठते हैं।

डा. जोशी के अनुसार आज नेपाल, बांग्लादेश, पाकिस्तान समेत दुनिया के तमाम देश जिस दशा से गुजर रहे हैं, इससे कम खराब स्थिति अटल जी के समय में नहीं थी। लेकिन अटल जी की समन्वयवादी सोच से पड़ोस के देशों को भारत के साथ सहयोग, शांति, समन्वय, साझेदारी और विकास को लेकर एक दिशा दी। वह परमाणु परीक्षण और पश्चिमी देशों के अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध के बाद जिस तरह से उससे निबटने में सफल रहे, वह एक मिसाल है।

उन्होंने देश के आर्थिक ढांचे, दूर संचार नीति, शिक्षा नीति, आधारभूत संरचना के विकास में नया मार्ग दर्शन दिया। वह इसी के लिए जाने गए। सबको मिलाकर और सबके साथ मिलकर, सबकी सुनकर हमेशा समस्याओं के  समाधान का रास्ता निकाला।

चाहे पार्टी के भीतर हो या बाहर, दलगत राजनीति हो या दलीय राजनीति से ऊपर उठकर देशहित का मामला हो, भारत के आंतरिक मामले हों या भारत के दूसरे देशों के साथ जुड़े हित या फिर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत जैसे विकासशील देशों की बात हो, अटल जी अपनी विधा के लिए जाने गए। देश के भीतर से लेकर दुनिया के देशों, राष्ट्राध्यक्षों ने उनकी क्षमता को खुद स्वीकार किया। डॉयलॉग ऑन सिविलाइजेशन पर जो अटल जी ने कहा उस पर दुनिया मुग्ध हो गई।

श्रद्धांजलि देने वालों को तो देखिए

अटल जी ने 1957 में पहला लोकसभा चुनाव जीता था। 18 अगस्त को यह देखकर ताज्जुब हुआ उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए उनको पहली लोकसभा में चुनने वाले लोग आए थे। ऐसे भी लोग थे, जिनकी उम्र तब कोई 10-12 साल रही होगी। डा. जोशी के अनुसार यह जुड़ाव कोई आसान बात नहीं है। इतने कम समय में स्मृति स्थल पर पहुंचने वालों की संख्या और देश-विदेश के लोगों की मौजूदगी अटल जी का औरा बताने के लिए पर्याप्त है।

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